चुनाव में 56% प्रत्याशी नोटा से पिछड़े, अधिकतर निर्दलीय; 13 सीटों पर नोटा तीसरे नंबर पर
विधानसभा चुनाव में इस बार ‘नोटा’ में वह तेवर नहीं दिखाया जैसा 2015 के चुनाव में दिखा था। पिछले चुनाव की तुलना में इस बार 0.80% कम लोगों ने ‘नोटा’ का बटन दबाया है। हर ईवीएम में नोटा का बटन होता है यानी ‘नोटा’ बतौर प्रत्याशी प्रत्येक विधानसभा में मौजूद रहता है। इस बार मैदान में 3733 दलीय या निर्दलीय प्रत्याशी थे।
कोई भी पार्टी ऐसी नहीं थी जिसके प्रत्याशी हर विधानसभा क्षेत्र में हों, लेकिन ‘नोटा’ था, और उसे वोट भी मिले। यहां बता दें कि चुनाव आयोग नोटा की गिनती बतौर निर्दलीय करता है। नोटा को मिले वोटों को देखें तो भोरे (सु.) और सरायरंजन दो ऐसे विधानसभा क्षेत्र रहे जिनमें ‘नोटा’ के वोट यदि प्रतिद्वंद्वी हासिल कर लेते तो नतीजा पलट जाता।
जीती हुई दो सीटें जदयू गंवा देता। कांटे की टक्कर वाली रामगढ़, हिलसा, बरबीघा जैसी प्राय: हर सीट पर ऐसा ही होता। प्रतिद्वंद्वी के खाते में इस वोट को गिने जाने की बात इसलिए कि ‘नोटा’ नापसंदगी का वोट होता है।
13 सीटों पर नोटा तीसरे नंबर पर
243 सीटों में 13 सीटें ऐसी हैं जहां नोटा तीसरे नंबर पर रहा। इन सीटों पर नोटा को अधिकतम 4 प्रतिशत तक वोट मिले। गौरतलब है कि इन 13 सीटों में 4-4 सीट क्रमश: जदयू और भाजपा जीती है। वहीं, राजद को 3, सीपीआईएम और कांग्रेस को एक-एक सीट पर जीत मिली।
इन 13 सीटों पर जीत का अंतर 462 से लेकर 18 हजार तक रहा। यहां बता दें कि 2009 में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से नोटा का विकल्प उपलब्ध कराने संबंधी अपनी मंशा से अवगत कराया था। 2013 और उसके बाद हुए चुनावों में नोटा विकल्प ईवीएम में शामिल हुआ।
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