शास्त्री जी मानवीय मूल्य व जीवन सौंदर्य के श्रेष्ठ सर्जक : डॉ. संजय
आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री भावनाओं में प्रवाहित होते हुए शब्दों का साक्षात्कार करते थे। वे गीत-कविता के शिखर पुरुष हैं। साहित्य की लगभग सभी विधाओं में लिखने वाले शास्त्री जी मानवीय मूल्य और जीवन सौंदर्य के श्रेष्ठ सर्जक हैं। ये बातें बेला पत्रिका के तत्वावधान में आयोजित महावाणी-स्मरण में डॉ. संजय पंकज ने कही।
निराला निकेतन की इस मासिक गोष्ठी में डॉ. पंकज ने कहा कि आचार्यश्री के महाकाव्य राधा को समझने के लिए परंपरा तथा प्रेम-तत्व को जानना जरूरी है। अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. देवव्रत अकेला ने कहा कि आचार्यश्री साधक थे।
डॉ. विजय शंकर मिश्र ने सबसे पहले आचार्यश्री की रचना जीवन भी मिला प्यार भी क्या और चाहिए/ गुलशन मिला बहार भी क्या और चाहिए.., इसके बाद कोरोना पर केंद्रित कविता- यह कैसा वक्त है, कोई किसी से हाथ नहीं मिलाता..., सुना कर समय का अहसास कराया।
कवयित्री डॉ. कुमारी अनु ने कोरोना का रोना छोड़ो, आओ एक नया विश्वास जगत में लाओ..., कवि वीरेंद्र वीरेन ने मैं विक्षिप्त का संक्षिप्त इतिहास हूं..., कवि ललन कुमार ने दुनिया चाहे कुछ भी कह ले उसकी मुझे परवाह नहीं..., डॉ. संजय पंकज ने जिस दिन से छूटी तितली की नरम नरम पंख छुअन, लगे रेंगने बिच्छू तब से तन-मन धड़कन धड़कन..., डॉ. देवव्रत अकेला ने जिंदगी यादों, ख्वाबों का अंबार है ... सुनाकर खूब तालियां बटोरीं। इस अवसर पर राम इकबाल सिंह राकेश स्मृति समिति के सचिव ब्रज भूषण शर्मा, पत्रकार राजकुमार ठाकुर आदि थे।
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