बूढ़ी गंडक उफनाई तो आशियाने डूबे; बांध पर लेनी पड़ी शरण, तंबू में कट रही जिंदगी
बूढ़ी गंडक नदी का पानी बढ़ता जा रहा है। दूर से ही बाढ़ प्रभावित अपने घरों को देखकर उसके होने की तसल्ली कर रहे हैं। अपने बसे-बसाए घर को छोड़कर जान बचाने के लिए परिवार और जरूरी सामान के साथ सुरक्षित ठांव की तलाश में भटक रहे हैं। बूढ़ी गंडक नदी का बांध बाढ़ प्रभावितों के लिए अभी सुरक्षित ठिकाना है। यहां पॉलिथीन से बने तंबू में सिर छिपाने को मजबूर सतीश कुमार व रेखा देवी ने अपने डूब रहे घरों को दिखाया। हनुमंत नगर के 200 से अधिक परिवार के लोगों के लिए अब यह बांध ही सहारा है। घर में चौकी के ऊपर रखे चौकी पर भी पानी चढ़ जाने के बाद पूरे परिवार के साथ बांध पर आने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। अब तो अपने घर को सिर्फ यहां से दिखा सकते हैं। घर के लिंटर तक पानी पहुंचने से वहां तक जाना भी अब दुरूह कार्य है। यह स्थिति केवल हनुमंत नगर की नहीं है। शहर के झील नगर, कर्पूरी नगर, बालू घाट, चंदबरदाई नगर, शेखपुर ढाब व विजयी छपरा में भी यही हाल है।
पानी में घिरे हुए घर तक पहुंचना भी मुश्किल
घर छोड़कर परिवार के साथ बांध पर आने की मजबूरी

घर डूबने के बाद अपना दुखड़ा बताता बांध पर शरण लेने वाला परिवार।
बूढ़ी गंडक नदी के जलस्तर में लगातार वृद्धि हो रही है। अपने घर और मोहल्ले में बाढ़ का पानी भर जाने से लोग जरूरी सामान व बच्चों के साथ पलायन कर रहे हैं। बांध पर पूरे परिवार के साथ रह रही गीता देवी ने बताया कि अपने पति, बहू और बच्चे के साथ घर छोड़कर बांध पर आना पड़ा है। एक आफत बाढ़ अौर दूसरी लगातार हो रही बारिश के कारण प्लास्टिक का छप्पर सभी को ढंकने में सक्षम नहीं है।
घर में ही सामान छोड़ लौटा परिवार
अपने डूब चुके घर को देखकर वापस लौट रहे विनोद सिंह अपनी पत्नी चमेली देवी व बच्चों के साथ बाढ़ के पानी के बीच से किसी तरह आ रहे हैं। विनोद ने बताया कि घर में ही सारा सामान पड़ा है। ऐसे में अगर चोरी भी हो जाए तो रिपोर्ट लिखवाने कहां जाएंगे। हम लोगों का तो ऊपर वाला ही अब सहारा है। अब क्या करें, प्रकृति के मार के सामने विवश हैं।
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