दो वक्त का भोजन मुश्किल था, मां चलने से लाचार थी, बेटा जापान में है इंजीनियर
बिहार का नालंदा विश्वविद्यालय दुनिया का सबसे पुराना विश्वविद्यालय है। नालंदा विश्वविद्यालय के पास के गांव में रहते थे सत्यदेव प्रसाद। उनकी इच्छा पढ़-लिखकर नौकरी करने की थी। लेकिन, गरीबी पढ़ने की इजाजत नहीं दे रही थी। फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। अपने पिता के साथ खेतों में काम करते हुए जैसे-तैसे गांव में ही रहकर ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई तो कर ली, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद नौकरी नहीं मिली।
सत्यदेव प्रसाद नौकरी की तलाश में भटक रहे थे और फिर इसी बीच उनकी शादी हो गई। एक बेटा हुआ। जिसका नाम उन्होंने सुधांशु रंजन रखा। वह सुधांशु को खूब पढ़ाना चाहते थे। उनकी इच्छा थी कि सुधांशु पढ़ाई करके कुछ अच्छा करे। छोटी उम्र से ही वह पढ़ने में खूब मन लगाता था। लेकिन, गांव में कोई खास सुविधा नहीं थी और कुछ काम नहीं मिलने की वजह से सत्यदेव प्रसाद के लिए भोजन की भी व्यवस्था करने में भी बहुत मुश्किलें आ रहीं थी। तब उन्होंने सोचा कि पटना चलते हैं और वहीं कुछ करेंगें।
सत्यदेव प्रसाद पत्नी और बच्चे के साथ पटना आ जाते हैं। एक कमरा किराए पर ले लिया। उसी एक कमरे में उनकी पूरी दुनिया थी। बेडरूम, किचेन और स्टडी-रूम। सबकुछ। कोई काम नहीं मिलने की हालत में घर-घर जाकर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का काम शुरू कर दिया। एक पुरानी साईकल भी खरीद ली। रोज पटना के एक छोर से दूसरे छोर तक साईकल चलाते हुए बच्चों के घर जाते थे पढ़ाने। पास के ही एक छोटे से प्राइवेट स्कूल में सुधांशु पढ़ने जाने लगा।
बड़ी मुश्किल से गृहस्थी की गाड़ी खिंच रही थी कि अचानक एक दिन सुधांशु की मां गिर गई। उन्हें गहरी चोट लगी। इलाज के लिए इतने पैसे नहीं थे कि किसी बड़े अस्पताल में भर्ती कराया जा सके। मजबूरन उन्हें सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन समुचित उपचार नहीं होने के कारण वे ठीक नहीं हो सकीं। अब सुधांशु की मां चल-फिर नहीं सकती थीं। उन्हें आगे की जिंदगी बिस्तर पर ही काटनी थी।
परिवार पर जैसे दुखों का पहाड़ ही टूट गया था। सत्यदेव प्रसाद पर भार और बढ़ गया। वे अब सुबह उठ जाते, पूरे परिवार के लिए खाना बनाते फिर उसके बाद घर की सफाई करते थे। शाम को घर-घर घूम कर ट्यूशन पढ़ाते और फिर रात में वापस आकर सुधांशु को भी पढ़ाते थे। मां कंचन देवी बिस्तर पर लेटे-लेटे सुधांशु को निहारती रहती थी। अब सुधांशु दसवीं कक्षा में पहुंच गया था। पर घर की आथिर्क स्थिति इतनी खराब थी कि किताब-कॉपी खरीदने तक में दिक्कतें आ रहीं थी।
पिता भी खूब मेहनत कर रहें थे, लेकिन इलाज के खर्च के कारण घर के किराए तक की व्यवस्था नहीं हो पा रही थी। मकान मालिक भी काफी परेशान कर रहा था। पर सुधांशु ने अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ी। दसवीं की बोर्ड-परीक्षा के फॉर्म के लिए सत्यदेव प्रसाद को ब्याज पर कर्ज लेना पड़ा। दसवीं के रिजल्ट के बाद परिवार में बहुत ख़ुशी थी। आगे की पढ़ाई के लिए सुधांशु अपने पिता के साथ मेरे पास आया और सुपर 30 का हिस्सा बन गया। बहुत ही शांत और शालीन था सुधांशु।
मेहनत में तो कोई कसर नहीं छोड़ता था। आखिर एक दिन इंतजार की घड़ियां खत्म हो गईं। सुधांशु का नाम आईआईटी के सफल विद्यार्थियों की सूची में था। उसका सलेक्शन जादवपुर यूनिवर्सिटी में भी हो गया। बेहतर ब्रांच के लिए उसने जादवपुर यूनिवर्सिटी से ही अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। आज सुधांशु एक बड़ी जापानी कंपनी में नौकरी कर रहा है। अपने माता-पिता को भरपूर सहयोग करता है। नए सिरे से मां का इलाज भी करवा रहा है।
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