विवाह व्यक्ति को सभ्य, सुसंस्कृत व उन्नत बनाने का महत्वपूर्ण धार्मिक संस्कार: रंगरामानुजाचार्य
हुलासगंज स्थित प्रसिद्ध आध्यात्मिक संस्थान के प्रमुख संत स्वामी रंग रामानुजाचार्य जी महाराज ने कहा कि विवाह व्यक्ति को सभ्य, सुसंस्कृत व उन्नत बनाने का महत्वपूर्ण संस्कार है। वे इन दिनों चर्तुमासा में सोशल मीडिया के माध्यम से श्रद्धालुओं का ऑनलाइन मार्गर्शन कर रहे हैं। मंगलवार को उन्होंने गृहस्थ आश्रम में विवाह के महत्व प्रसंग को विस्तार से रेखांकित किया। उन्होंने विवाह के उद्देश्य के बारे में विस्तार से जानकारियां देते हुए बताया कि षोडश संस्कार में गृहस्थ आश्रम के लिए विवाह एक विशेष महत्वपूर्ण संस्कार है।
यह केवल काम पूर्ति के उद्देश्य मात्र नहीं है बल्कि यह मानव को सभ्य, सुसंस्कृत तथा उन्नत बनाने का एक बेहतरीन संस्कार है। स्वामी जी ने कहा कि अगर यह संस्कार नहीं होता तो मानव में मां, बहन, बेटी आदि की पहचानने की शक्ति नहीं होती। ऐसे में मानव पशुओं के समान व्यवहार करके मानव जाति के लिए अभिशाप बन जाता। उन्होंने शास्त्रों का हवाला देते हुए कहा कि वैवाहिक विधि के अनुसार प्राप्त पत्नी द्वारा ही गृहस्थ आध्यात्मिक कर्मों का अनुष्ठान में सफलता प्राप्त करता है।
पिता अपनी पुत्री को देवता, गुरु तथा अग्नि को साक्षी रखकर कन्यादान करता है और वर देवता गुरु अग्नि को साक्षी मानकर प्रतिज्ञा करता है कि धर्म, अर्थ और काम इन तीन पुरुषार्थों के उपार्जन में पत्नी को सदा साथ रखूंगा। गृहस्थों के पत्नी के बिना धार्मिक कार्य सफल नहीं हो सकते। मनुष्य पर तीन प्रकार के ऋण रहते हैं। देव ऋण, ऋषि ऋण, और पितृ ऋण। यज्ञयाग, देव पूजन आदि के द्वारा देव ऋण से मुक्त होता है। वेद गीता आदि शास्त्रों के स्वाध्याय से ऋषि ऋण से मुक्त होता है तथा पुत्र प्राप्ति के बाद ही पितृऋण से उद्धार होता है।
वैवाहिक विधि से गृहीत स्त्री से उत्पन्न पुत्र ही पितरों का उद्धार कर सकता है। उसमें ही पुत्र शब्द सार्थक होता है। मनुस्मृति में कहा गया है कि पुम नाम एक नरक हैं। और जो उस पुम नाम नरक से उद्धार करता है, उसे ही पुत्र कहते हैं। अतः विवाह एक विशेष महत्वपूर्ण संस्कार है। इसे केवल काम पूर्ति के उद्देश्य न समझें। उन्होंने विवाह के मान्य संस्कारों व आदर्श आचार संहिता के पालन के लिए श्रद्धालुओं को प्रेरित किया।
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