समाजवादियों को उम्मीद थी कि पहली सरकार उनकी बनेगी, पर फिर गया पानी
(भैरव लाल दास) श्यामा प्रसाद मुखर्जी पहले नेहरू कैबिनेट के सदस्य थे। कश्मीर मुद्दे पर उनका नेहरू से विवाद हुआ और उसके बाद वे कांग्रेस से अलग हो गए। जनसंघ का गठन हुआ। उधर, 1950 में कम्युनिस्ट पार्टी में भी गुटबाजी शुरू हो गई थी। 1951 में आचार्य जेबी कृपलानी कांग्रेस से बाहर हो गए। समाजवादियों ने अलग गढ़ बना लिया था। लेकिन बिहार विधानसभा में पराजय के अपमान का घूंट सबसे अधिक समाजवादियों को ही पीना पड़ा। जय प्रकाश नारायण को उम्मीद थी कि बिहार में उनकी पार्टी की सरकार बन जाएगी। यहां समाजवादियों का खासा प्रभाव रहा है।
जय प्रकाश नारायण, रामनंदन मिश्र, योगेन्द्र शुक्ल सरीखे नेताओं की यह कर्मभूमि रही है। कांग्रेस के बाद राज्य में समाजवादियों का ही राजनीतिक वर्चस्व था। 1952 के चुनाव में 330 सदस्यीय विधानसभा में सोशलिस्ट पार्टी ने 247 उम्मीदवार खड़े किए पर पार्टी 23 सीट ही जीत पाई। कांग्रेस ने इस चुनाव में 239 सीटें जीतीं। झारखंड पार्टी को 33, जनता को 11, राम राज्य परिषद को 1,फॉरवर्ड ब्लॉक को 1, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को 1, एलएस संघ को 7 और 14 निर्दलीय प्रत्याशी जीते। इस चुनाव में 1602 उम्मीदवार मैदान में थे जिनमें 854 की जमानत जब्त हो गई। 19 महिला उम्मीदवारों में 13 जीतीं। 1952 के चुनाव ने बिहार की जनतांत्रिक व्यवस्था को बुरी तरह झकझोर दिया। गैर-कांग्रेसियों की इस चुनाव में भारी पराजय हुई। राजनीतिक पार्टियों के अंदर लोकतांत्रिक व्यवस्था एकदम से बिखर गई।
बसावन सिंह, रामानंद तिवारी की जीत से बंधी उम्मीद
सोशलिस्ट विचारधारा के बसावन सिंह को डेहरी से, रामानंद तिवारी को शाहपुर से और कर्पूरी ठाकुर को ताजपुर से सफलता मिली। इन नेताओं की जीत से विरोधी दलों में आशा बंधी कि उनकी बातों को कुचला नहीं जाएगा। जो बड़े दिग्गज इस चुनाव में हारे उनमें पकरीबरावां से जदुनंदन शर्मा, सिकटा से केदारमणि शुक्ल, जाले से जमुना कार्जी, रोसड़ा से रमाकांत झा, शेखुपरा से कार्यानंद शर्मा, त्रिवेणीगंज से बीएन मंडल, देवघर से विनोदानंद झा और चक्रधरपुर से श्यामाचरण तुबिद चुनाव हार चुके थे। गिरीडीह से कामाख्या नारायण सिंह को हराकर केबी सहाय जीते वहीं बड़कागांव से केबी सहाय को हराकर कामाख्या नारायण सिंह जीत गए।
उम्मीदवारों के पास खर्च करने की बिल्कुल औकात नहीं थी
कांग्रेस के दिग्गज नेता लहटन चौधरी ने 1952 के चुनाव को याद करते हुए 1986 में लिखा कि कांग्रेस और सोशलिस्ट दोनों ही दल साधनविहीन थे। किसी भी उम्मीदवार को अलग जीप नहीं थी। घूमने का साधन बैलगाड़ी, घोड़ा और साइकिल थी। एक भी उम्मीदवार के पास 3-4 हजार से ज्यादा खर्च करने की औकात नहीं थी। मेरे पास तो एक भी पैसा नहीं था, सो खर्च करने का सवाल ही कहां! गांव में कांग्रेसजनों ने थोड़ा बहुत चावल-दाल इकट्ठा किया। तब और आज में धरती-आसमान का अंतर पड़ गया। अब तो लाख रुपए खर्च के बावजूद सबसे विश्वसनीय साधन बन गया है- रिवॉल्वर, बम और जातिवाद।
जब कर्पूरी ठाकुर ने किया हथियार उठाने का आह्वान
उच्च जातियों के बीच वर्चस्व की लड़ाई, बिहार में मध्य और निम्न जातियों में फैलनी ही थी। 1985 में बिहार विधानसभा में कर्पूरी ठाकुर द्वारा दिया गया भाषण इसका आईना है। उन्होंने कहा था...मध्य और निम्न जातियों को यदि चुनावी सफलता प्राप्त करनी है तो उन्हें सामरिक संघर्ष से पीछे नहीं हटना होगा। कोई लुटेरा वोटरों आता है, बूथों पर कब्जा करता है। वोटरों को अधिकार है कि उनको हथियार से मार भगाएं। कानून ने इस देश के नागरिकों को बालिग मताधिकार दे रखा है। अपने अधिकार की रक्षा, जान-जायदाद की रक्षा का अधिकार प्राप्त है हमें। इसके लिए हिंसा का सहारा लेना पड़ेगा तो लें। इसी के लिए हथियार उठाने को कहा है। मैंने ऐसा कहकर सरकार की मदद की है। क्या सरकार चाहती है कि नाजायज ढंग से इस देश में जनतंत्र चले। सरकार हर्गिज ऐसा नहीं चाहती है। मगर यह हो रहा है। सज्जनों के पास हथियार नहीं हैं। जो अपराधमर्मी हैं, अराजक तत्व हैं, उनके पास हथियार हैं, तो सज्जन कैसे जीएंगे। प्रशासन निकम्मा है, नपुंसक है। जब प्रशासन नपुंसक है तो नागरिक कैसे जीवित रहेंगे। मैंने कहा है कि आर्म्स एक्ट को रिपील कर दिया जाए, जिनके पास पैसा होगा, हथियार खरीदेंगे और हथियार खरीदने के बाद रजिस्ट्रेशन करा देंगे। जिस तरह रेडियो का रजिस्ट्रेशन होता है, उसी तरह का रजिस्ट्रेशन होगा।
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