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क्वारेंटाइन से बाहर निकली पॉलिटिक्स लॉकडाउन भी टूटा, लड़ने लगे नेतागण

क्वारेंटाइन से बाहर निकली पॉलिटिक्स लॉकडाउन भी टूटा, लड़ने लगे नेतागण

(मधुरेश)बिहार की पॉलिटिक्स, क्वारेंटाइन से बाहर निकलकर, लॉकडाउन तोड़ चुकी है। नेताओं की टोली लड़ रही है। पॉलिटिक्स की स्टेपिंग/स्टेजिंग, बिल्कुल कोरोना की तरह रही। कोरोना की तरह पॉलिटिक्स अभी प्रोड्रोमल स्टेज में है। इस स्टेज में लक्षण खुलेआम होता है। पॉलिटिक्स भी अपनी पूरी आदत के साथ अपने पूरे लक्षण में है। आदत, सामने वाले को सीधे नकारने-खारिज करने की; लक्षण ‘हां’ का उलट जवाब ‘ना’ में देने की। कोरोना की तरह पॉलिटक्स का भी पिक आना बाकी है।
कोरोना को देखते हुए नेताओं ने पॉलिटिक्स के लॉकडाउन की बात खुद तय की थी। बारी-बारी से सबने यही कहा या इसे कबूल किया कि संकट का यह बड़ा मोर्चा (कोरोना), सबकी एकजुटता से ही फतह होगा। राजद, कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों ने सरकार का साथ देने की बात कही। चाहे मुख्यमंत्री राहत कोष में रुपये देने की बात हो या मुख्यमंत्री क्षेत्र विकास योजना के तहत जनप्रतिनिधियों के कोटे से रुपये लेने की बात हो, सर्वदलीय एकजुटता की ऐसी कई गवाही है।

खैर, सबने अपने को क्वारेंटाइन किया। बयानबाजी बंद। आरोप-प्रत्यारोप ठप। लेकिन पॉलिटिकल वायरस, जिससे नेता ताउम्र इंफेक्टेड रहते हैं, नेताओं के क्वारेंटाइन के दौरान इन्क्यूबेशन स्टेज में आ गया। इस स्टेज में बहुत हल्की मात्रा में प्रारंभिक लक्षण दिखने से लगते हैं। ऐसा नेताओं ने भी दिखाया। विपक्षी नेताओं के सलीकेदार बयान शुरु हुए। बहुत मर्यादित शब्द। आग्रह-निवेदन का भाव लिए। सकारात्मकता की ऐसी पराकाष्ठा कि नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव तक सरकार से अनुरोध कर रहे हैं कि ‘जनहित में अगर ऐसा हो जाता, तो बड़ी कृपा होती।’

बिल्कुल कोरोना के माफिक जब पॉलिटिकल वायरस, इन्क्यूबेशन से प्रोड्रोमल स्टेज की तरफ बढ़ा, तो इसी रफ्तार या तेवर में नेताओं की जुबानें भी तल्ख हुईं। पॉलिटिक्स का जुबानी जंग वाला मोर्चा, बिल्कुल पहले जैसा हो गया है। सब के सब लॉकडाउन भूलकर पुराने मोड में हैं। अब एक बोलेगा, तो दूसरा कैसे और क्यों चुप रहेगा? फिलहाल, राहत यही है कि नेताओं की जुबानी लड़ाई, अंग-प्रत्यंग तक ही पहुंची है। कोई, किसी की आंख में खराबी बताकर चश्मा बदलने की सलाह दे रहा है, तो किसी ने मान लिया है कि फलां की आंख-कान दोनों खराब है और दिल तो है ही नहीं। इससे, आगे के पिक स्टेज का अंदाज किया जा सकता है, जब शब्द लजा जाएंगे।

कोरोना काल में हमदर्द बताने की पार्टियों में होड़

इसी साल बिहार विधानसभा का चुनाव होना है। इसलिए कोरोना आफत के मौके पर अपने को जनता का सबसे बड़ा हमदर्द बताने की होड़ है। कोई भी नहीं चाहता कि इसका श्रेय, कोई और ले। जो कुछ भी नहीं कर रहा है, वह बोलकर काम चला ले रहा है। ट्वीटर पर, अपनी बातों का यू-ट्यूब बनाकर। कुछ फोटोजेनिक बने हैं। कुछ के पास सिर्फ आलोचनाएं हैं, तो कई के पास बस सलाह। कुछ नेता, लोगों को यह बताने में लगे हैं कि शासन के स्तर से जो कुछ भी हो रहा है, वह उन्हीं के दबाव या प्रयास का नतीजा है। तर्ज यही कि ‘मैंने कहा था, इसलिए हो गया।’ हिसाब मांगा जा रहा है। जवाब में हिसाब दिया जा रहा है। यह सबकुछ, सुबह से ही स्टार्ट हो जाता है। कुछ नहीं, तो बात इसी सवाल से शुरू हो जाती है कि फलां नेता जी कहां हैं? और फिर इसके हवाले दिन भर की राजनीति और इस क्रम में यह हवाला भी कि देखिए, हम क्या-क्या कर रहे हैं और आपने कब-कब, क्या-क्या नहीं किया?



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Politics lockdown broke out of quarantine also broken, leaders started fighting


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