कोरोना के वैश्विक आंकड़े और छिपे मरीजों की जानकारी डरा रही, 25% बढ़े मानसिक मरीज
भूकंप का दौर जिस तरह लोगों को डरा रहा था, कोरोना ने उससे ज्यादा डरा दिया है। उस समय लोग डॉक्टर के पास दौड़ भी जा रहे थे, अभी लॉकडाउन में वह भी नहीं हो पा रहा। डर ऐसा है कि अररिया, सुपौल जैसे सुदूरवर्ती जिलों से परिजन बाइक पर ऐसे मानसिक बीमार मरीजों को लेकर पटना आ रहे हैं। मानसिक रोग विशेषज्ञों की मानें तो उनके रोगियों की संख्या 25 फीसदी तो जरूर बढ़ गई है।
टीवी पर दिनभर कोरोना की वैश्विक त्रासदी की खबरें और देशभर में इसके छिपे मरीजों की जानकारी लोगों को इतना डरा चुकी है कि बाहरी तौर पर स्वस्थ व्यक्ति भी दुनिया के खात्मे की आशंका से सो नहीं पा रहा। एंजाइटी, डिप्रेशन के साथ पैनिक अटैक तक के केस सामने आ रहे। जबकि, विशेषज्ञ साफ कह रहे कि लॉकडाउन का पालन हुआ तो यह बीमारी हार जाएगी। इससे ज्यादा लोग सड़क हादसों से मरते हैं, लेकिन लोग नाहक डरकर मानसिक बीमारी के शिकार हो रहे।
देश-दुनिया की चिंता से बढ़ रहा बीपी
वरीय मनोचिकित्सक डॉ. विनय कुमार कहते हैं कि घर में बैठे लगातार कोरोना की खबरें देखते रहने से घबराहट और तनाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है। सोशल मीडिया पर बकवास चल रहा। हद यह है कि लोग इस चिंता में हैं कि भारत अमेरिका को दवाई दे रहा है, जबकि उसके पास संसाधन नहीं। वैक्सीन नहीं बना, इसकी चिंता है। लॉकडाउन बढ़ेगा कि नहीं, नहीं बढ़ेगा तो बीमारी रुकेगी कि नहीं...ऐसी चिंताएं बीमार बना रहीं। नींद गायब हो जा रही। बीपी बढ़ रहा। बीपी कई बीमारियों की जड़ है। एक बीमारी के डर से कई बीमारियों को बुलावा भेजना गलत है। अगर कोरोना के हल्ले से रातों की नींद उड़ गई है और सोच रहे कि अब कोई नहीं बचेगा तो मानसिक रोग के बॉर्डर लाइन में घुस चुके हैं।
पॉजिटिव खबरों पर नहीं हो रहा विश्वास
मानसिक आरोग्य अस्पताल कोइलवर के डॉ. जयेश रंजन की केस स्टडी कहती है कि टीवी पर दुनिया में कोरोना के बढ़ते आंकड़ों और भारत में छिपे संक्रमित के सामने आने से सामान्य लोग भी डरे हुए हैं। बिहार में स्थिति नियंत्रित होने की पॉजिटिव खबरों पर इन्हें विश्वास नहीं हो रहा। अपनी, परिवार, समाज की ही नहीं, पूरी दुनिया की मौत का डर सता रहा है। कांके अस्पताल में पोस्टिंग समय से ही कदमकुआं में प्रैक्टिस कर रहे डॉ. जयेश बताते हैं कि ऐसे लोगों को परिजन सुपौल, अररिया जैसे सुदूरवर्ती जिलों से बाइक पर लिए पटना चले आ रहे हैं। लॉकडाउन में मरीज तो गिनती के हिसाब से ही आ रहे हैं, लेकिन इलाजरत के अलावा ठीक हो चुके मरीजों और नए मरीजों के कॉल से यह तो पक्का हो रहा है कि 25% मानसिक रोगी बढ़ गए हैं। स्टूडेंट भी मरीज बन रहे। एक प्रशासनिक अधिकारी का बेटा सिर्फ इसलिए बीमार पड़ गया क्योंकि दिल्ली में उसका दोस्त क्वारेंटाइन हो गया। 10 दिन की दवा और कुछ व्यावहारिक परिवर्तन से वह ठीक हो गया।
घर में रखें नजर, खुशी की ओर करें डायवर्ट
मनुष्य सामाजिक प्राणी है। समाज से दूर रहे तो स्ट्रेस और डिप्रेशन की आशंका रहती है। उसपर टीवी पर एक ही खबर लोगों को नकारात्मकता की ओर धकेल रही। ऐसे में घर के अंदर पहचान सबसे पहले जरूरी है। लगे कि घर में कोई ज्यादा चिंतित है तो उसे डायवर्ट करें। फिल्में दिखाएं, खासकर हंसाने वाली। सोते समय अच्छी यादों की कहानियां निकालें। एलबम देखें। शाम में बालकनी से थोड़ी भी शीतल हवा मिले तो बाहें फैला उन्हें महसूस कीजिए।-डॉ. बिंदा सिंह, क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट
सोशल मीडिया का वक्त योग-ध्यान को दीजिए
सोशल मीडिया से दूर रहिए। यह समय योग-ध्यान को दीजिए। स्ट्रेस बढ़े तो शवासन कीजिए। जो संगीत पसंद है, उसे सुनिए। लगातार सुनेंगे तो खाली समय गुनगुना लेंगे। किताबें पढ़िए। रामायण को समझने के लिए रामचरित मानस पढ़ें तो अच्छा। कैंपस में खुली हवा में थोड़ी देर टहलिए। शरीर को हाइड्रेट रखने के लिए नींबू पानी पीते रहिए। छोटे बच्चों को अपने खानदान के बारे में बताइए। लॉकडाउन में निकले तो किसी की मदद कर मन को बुलंद कीजिए। -डॉ. विनय कुमार, वरीय मनोचिकित्सक
शॉक की खबरें छोड़िए, शौक को समय दीजिए
जो बीमारी सामने है, वह नियंत्रित जरूर होगी। भारत के आंकड़े बेचैन नहीं कर रहे। सख्ती इसे नियंत्रित करने के लिए है। इसलिए, इसकी चिंता तो छोड़ ही दीजिए। टीवी पर ऐसी न्यूज देखने की जगह भरोसे का अखबार पढ़िए, बस। अपना शौक, जो वक्त नहीं मिलने के कारण कहीं छूट गया था, उसे मन के कोने से निकालिए। परिवार की बातें कीजिए और इससे कोरोना को आउट कर दीजिए। एक ही बात जानिए, मानव ऐसे ही यहां तक नहीं पहुंचा है। उसे हराना असंभव है। -डॉ. जयेश रंजन, वरीय मनोचिकित्सक
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