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हाथ से दबाई ईंट - टुकड़े-टुकड़े हो गए, बालू में पत्थर की मिलावट मरे पत्थर का वाकिंग ट्रैक, गड़बड़ी की परत उखड़ने-टूटने लगी

हाथ से दबाई ईंट - टुकड़े-टुकड़े हो गए, बालू में पत्थर की मिलावट मरे पत्थर का वाकिंग ट्रैक, गड़बड़ी की परत उखड़ने-टूटने लगी

देश के 100 स्मार्ट सिटी में शुमार हुए भागलपुर शहर को चार साल बीत गए हैं। अब तक स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत केवल दो काम शुरू हुए हैं। इनमें सैंडिस कंपाउंड का सौंदर्यीकरण और कमांड एंड कंट्रोल का भवन निर्माण शामिल है। 37 करोड़ की लागत से सैंडिस कंपाउंड के सौंदर्यीकरण के काम पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। निर्माण में गड़बड़ी के आरोप लगाए जा रहे हैं।

हकीकत जानने के लिए दैनिक भास्कर ने भागलपुर कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के विशेषज्ञों की चार सदस्यीय टीम से वहां का टेक्निकल ऑडिट कराया। इसमें चौंकानेवाले सच सामने आए। पड़ताल के दौरान भ्रष्टाचार की परत खुलने लगी। हर स्तर पर गड़गड़ी की गई है। सैंडिस कंपाउंड में चल रहे मुख्य रूप से तीन काम वाकिंग ट्रैक, पुराने टिल्हा का सौंदर्यीकरण और ओपेन एयर थियेटर का टीम ने करीब ढाई घंटे तक बारीक पड़ताल की। हर काम में व्यापक गड़बड़ी मिली। घटिया निर्माण सामग्री के इस्तेमाल से लेकर मानक की अनदेखी का भी मामला पकड़ में आया।

सड़क निर्माण में घटिया ईंट का इस्तेमाल किया गया है, जिससे हाथ से दबाने के साथ उसके दो टुकड़े हो गए। टाइल्स के नाम पर रेड स्टोन यानी मरे हुए पत्थर लगाए गए हैं। उसकी फीटिंग भी सही ढंग से नहीं की गई है। पानी निकासी के लिए स्लोप नहीं बनाए गए हैं। बालू में बड़े-बड़े पत्थर मिले। एक्सपर्ट के मुताबिक अगर तत्काल काम में गुणवत्तापूर्ण सामग्री का इस्तेमाल और मानक का पालन नहीं किया गया तो बनने के कुछ दिनों के बाद ही वाकिंग ट्रैक टूटने लगेगा।

इस तरह की निर्माण सामग्री का हो रहा इस्तेमाल

1. टीम ने मौके पर उपलब्ध बालू, ईंट व अन्य मैटेरियल को चेक किया। मानक के मुताबिक 4.75 एमएम का बालू मिला। हालांकि बालू में ठोस मिट्टी व 55 एमएम के पत्थर मिले।

2. पैदल पथ निर्माण में टाइल्स की जगह रेड स्टोन (मरा हुआ पत्थर) लगाया गया है। एक्सपर्ट ने बतया कि इस पत्थर की उम्र छह से सात वर्ष होती है। पत्थरों के बीच जो बाउंडिंग होनी चाहिए, वह नहीं है।

3. सड़क और वाकिंग ट्रैक के निर्माण में जिस ईंट को लगाया जा रहा था, उसमें 20 प्रतिशत से ज्यादा नमी थी। जबकि पांच प्रतिशत से ज्यादा नमी नहीं होनी चाहिए।

जानिये, सैंडिस के सौंदर्यीकरण के नाम पर चल रहे मुख्य तीन तरह के काम की हकीकत

उखड़ रहे पत्थर, पानी कम दिया, सीमेंट नहीं जमा

वाकिंग ट्रैक पर रेड स्टोन लगाए गए हैं जबकि पैवर ब्लॉक बेहतर होता है। उस पर चलने से जल्दी थकान नहीं होती है। रेड स्टोन में भी गड़बड़ी मिली। जगह-जगह लगाए गए पत्थर ऊखड़ चुके हैं। कुछ स्थानों पर यह टूटने भी लगे हैं। ट्रैक के नीचे पर्याप्त मैटेरियल नहीं रहने से वजन पड़ते ही नीचे से आवाज आने लगती है। सीमेंट पर 10-12 दिन ही पानी दिए गए। इस कारण यह जम नहीं सका। टायल्स में जोड़ भी हैं। ट्रैक में कहीं भी बारिश के पानी की निकासी के लिए रास्ता नहीं बनाया है, ऐसे में पानी जमा होने से टायल्स जल्दी खराब होगा।

होना यह चाहिए था: ट्रैक को तैयार करने के कम से कम 21 दिन तक पर्याप्त पानी देना चाहिए। एक्सपर्ट इंजीनियर की निगरानी में यह काम होना चाहिए था, ताकि गड़बड़ी की संभावना कम रहती। साथ ही टायल्स लगाने के दौरान एक्सपर्ट राजमिस्त्री को रखना चाहिए।

पानी की निकासी नहीं, इमरजेंसी गेट का अभाव

ओपेन एयर थियेटर के निर्माण में सबसे बड़ी गड़बड़ी टीम को पानी निकासी की व्यवस्था में दिखी। जहां से पानी की निकासी होगी, वहां स्लोप नहीं बनाया गया है। इससे पानी वापस आ जाएगा। दर्शकों की बैठने वाली जगह तक जाने के लिए कुल 21 सीढ़ी बनी हैं। इनमें एक कतार में चार स्टेप बैठने के लिए है। टीम ने एलाइनमेंट में मिस्टेक बताया। साथ ही किसी तरह के हादसे में इमरजेंसी गेट का अभाव बताया। ऊपरी हिस्से में जहां स्टील से बैरिकेडिंग की गई है, वहां एक इमरजेंसी गेट की जरूरत की बात कही गई।

होना यह चाहिए था: बड़े शहरों में ओपेन एयर थियेटर में पानी निकासी से लेकर दर्शकों के बैठने तक की व्यवस्था बेहतर होती है। खास तौर पर सुरक्षा की दृष्टि से इमरजेंसी गेट भी लगाए जाते हैं। वॉशरूम भी अलग से होते हैं।



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सैंडिस कंपाउंड में सड़क निर्माण में घटिया ईंट का उपयोग हो रहा है। एक्सपर्ट की टीम ने उसे हाथ से दबाया तो टूट गई।


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