मिथिलांचल में छठ पर्व पर ‘कोसी भरने’ की पुरानी परंपरा
आधुनिकता के बीच आज भी सदियों से चली आ रही कोसी भरने की परंपरा। इस वर्ष महंगाई का असर के बावजूद लोगों में इस आस्था भाव में कोई कमी नहीं आयी है। इस वर्ष कुम्हारों द्वारा भारी संख्या में कोसी में प्रयुक्त होनेवाले मिट्टी के बरतनों को बनाया गया है।
सूर्यषष्ठी की संध्या में छठी मइया को अर्घ्य देने के बाद घर के आंगन या छत पर कोसी पूजन होता है। इसके लिए कम से कम चार या सात गन्ने की समूह का छत्र बनाया जाता है। एक लाल रंग के कपड़े में ठेकुआ, फल अर्कपात, केराव रखकर गन्ने की छत्र से बांधा जाता है। उसके अंदर मिट्टी के बने हाथी को रखकर उस पर घड़ा रखा जाता है।
मिट्टी के हाथी को सिंदूर का टीका
मिट्टी के हाथी को सिंदूर लगाकर घड़े में मौसमी फल व ठेकुआ, अदरक, सुथनी आदि सामाग्री रखी जाती है। कोसी पर दीया जलाया जाता है। उसके बाद कोसी के चारों ओर अर्घ्य की सामाग्री से भरी सूप, डगरा, डलिया, मिट्टी के ढक्कन व तांबे के पात्र को रखकर दीया जलाते हैं।
मिट्टी का हाथी महंगा हुआ तो भी परवाह नहीं
आधुनिकता के बीच आज भी सदियों से चली आ रही यह पुरानी परंपरा जीवंत है। कोसी के दाम बढ़ने पर भी आस्था भाव में कमी नहीं जहां रविवार को कोसी भरने के लिए इस साल भी लोगों ने मिट्टी के हाथी की जमकर खरीदारी की है। बढ़ती महंगाई का असर कोसी के दाम पर भी पड़ा है, बावजूद इसके आस्था भाव में कोई कमी नहीं आयी है। इस वर्ष कुम्हारों द्वारा भारी संख्या में कोसी में प्रयुक्त होनेवाले मिट्टी के बरतनों को बनाया गया है।
मुरादों के पूर्ण होने पर कोसी भराई करते हैं श्रद्धालु
छठ करनेवाले व्रतियों समेत श्रद्धालु द्वारा छठी मइया से अपने मनोवांछित कामनाओं के पूर्ण होने की मुरादें मांगी जाती हैं एवं मुरादों के पूर्ण होने पर कोसी भराई कर श्रद्धालु अपने वचन को पूरा करते हैं। वही छठव्रती बताती है की कोई महिला अपने घर में ‘चिराग’ आने की खुशी में कोसी भरती हैं, तो कोई शारीरिक स्वस्थता के अलावा अपनी मन्नतों के पूर्ण होने पर छठी मइया के प्रति कृतज्ञता का भाव दिखाने के लिए कोसी भरना नहीं भूलती है। कोसी भराई की रस्म अदायगी मन्नतों के पूर्ण होने का भी संकेत देती है।
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