पिछली बार छठ पर मिलते ही गाने लगीं मृदुला- कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए..
गोवा की पूर्व राज्यपाल और साहित्यकार डॉ. मृदुला सिन्हा का बुधवार की दोपहर दिल्ली में निधन हो गया। 78 वर्षीय डॉ. सिन्हा को 14 नवंबर यानी दीपावली की रात हृदय में दर्द होने पर परिजनों ने अस्पताल में भर्ती कराया था। परिवार से जुड़े सदस्यों ने बताया कि ऑपरेशन के चार दिन बाद उनका निधन हो गया।
अंतिम संस्कार दिल्ली में ही किया जाएगा। निधन के वक्त उनके बेटे नवीन सिन्हा और बहू संगीता सिन्हा साथ थे। डॉ. सिन्हा के निधन से पूरे बिहार में शोक की लहर दौड़ गई है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राज्यपाल फागू चौहान, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गहरा शोक जताया है।
उनमें माता का स्वभाव था, हमेशा प्राेटाेकाॅल ताेड़ कर लाेगाें से मिलती थीं: पद्मश्री उषाकिरण खान
उनका व्यक्तित्व अत्यंत सरल था। लाेक जीवन से गहरा लगाव था। अक्सर वाे अपने भाषण या बातचीत के बीच काेई गीत गाने लगतीं। पिछली बार छठ से पहले मुलाकात हुई, ताे इस लाेक पर्व के महत्व पर चर्चा हाेने लगी। बात करते-करते वे मधुर आवाज में गाने लगीं-कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए..। उनका स्वभाव माता का था। इसीलिए जैसे मां अपने बच्चों को गाकर समझाती हैं, उसी तरह वे गाने लगतीं।
इतने बड़े ओहदे पर हाेने के बावजूद उन्हें गाते देखकर लाेग खूब आनंदित हाेते। वे जब भी किसी गाेष्ठी, कार्यक्रम में मिलीं, ताे खुलकर बात करती थीं। उन्हें प्राेटाेकाॅल पसंद नहीं था। हम सबसे मिलने में कभी उन्हाेंने इसकी परवाह नहीं की। उनके एडीसी हमेशा परेशान रहते थे। मृदुला जी के लिए प्राेटाेकाॅल से ज्यादा लाेग महत्वपूर्ण थे। मृदुला जी की कई पुस्तकें प्रकाशित हैं।
मुख्यत: उनका लेखन कथेतर गद्य में रहा, जिसकेे केंद्र में स्त्री की दशा और दिशा की बातें हैं। उनकी एक चर्चित पुस्तक है-बिटिया है विशेष। हमारे समाज में बेटी को कम तवज्जो दी जाती है। इस पिछड़े सोच से बाहर निकालती है पुस्तक। वे अपनी पुस्तक में उदाहरणों से समाज को संदेश देती हैं कि बिटिया खास होती है। उसका पूरा ध्यान रखें।
उनकी एक और खास पुस्तक है सीता पुनि बोली। यह पुस्तक जनक-दुलारी सीता के शौर्यपूर्ण जीवन पर कथात्मक उपान्यास है। इस पुस्तक में मृदुला जी ने सीता के व्यक्तित्व के ऐसे पहलुओं को सामने लाया, जिसकी आम जीवन में कम ही चर्चा होती है। वे सिर्फ साहित्यकार नहीं थीं, बल्कि जमीन से जुड़ी कार्यकर्ता भी थीं। उन्होंने न सिर्फ साहित्य के जरिये स्त्री के दर्द, प्रेम, उसकी संभावनाओं के बारे में लिखा, बल्कि हमेशा मदद भी की।
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