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चले गए प्राध्यापक, समाजवादी चिंतक, राजनेता और गरीब, पीड़ित, शोषित व आम लोगों के संघर्षों के हथियार

चले गए प्राध्यापक, समाजवादी चिंतक, राजनेता और गरीब, पीड़ित, शोषित व आम लोगों के संघर्षों के हथियार

(शिशिर कुमार) प्राध्यापक, समाजवादी चिंतक, राजनेता और गरीब, पीड़ित, शोषित व आम लोगों के संघर्षों के हथियार यानी रघुवंश बाबू। यहां के लोग ज्यादातर पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह को इसी नाम से जानते या संबोधन करते थे। जब भी शहर आते और सर्किट हाउस की कमरा संख्या 3 में रुकते। उनके आने की सूचना मात्र से कार्यकर्ता से लेकर आम लोगों का जमावड़ा लग जाता।

वे पार्टी से अधिक क्षेत्र की समस्या, अपने-पराये के बारे में जानकारी लेने से लेकर ठेठ गवई भाषा में पुराने समय के किस्से कहानियां सुनाते थे। थोड़ी-थोड़ी देर पर सामने वाले से सवालिया लहजे में जवाब भी लेते। राजद नेता इकबाल मो. शमी कहते हैं- उनकी कई बातें शहर-गांव के लोगों को अब बहुत याद आएगी। सर्किट हाउस के बरामदे पर सुबह में खादी की गंजी-धोती में लकड़ी की कुर्सी पर बैठना।

जाड़े में बाहर पेड़ के नीचे मजमा। सुबह टहलने के बाद दातून करते हुए लोगों की समस्या सुनने-सुनते आधा दातून खत्म हो जाता था। समस्या रखने वाले की पीड़ा के समाधान से पहले उसकी निराशा दूर हाे जाती थी। वे समस्या सुनने के बाद उसके समाधान के लिए हर तरह से लगते भी थे। हर सुख-दुख में पहुंचना तो आदतों में शुमार था। लॉकडाउन के दौरान के बाद भी वे कई समारोहों में पहुंचे।

इसी दौरान उन्हें कोरोना संक्रमण हुआ। ज्यादा न घूमने की सलाह दी गई तो पूछा- कोरोना है, तो अपने-पराये से मिलना छोड़ दें? सबसे बड़ी खासियत थी कि वे हर अखबार की अधिकतर खबर पढ़ते और समस्याओं काे लेकर लोगों से सच्चाई जानते। फिर बिना बुलाए पीड़ित से मिल कर आंदोलन खड़ा करते। राजनीति में कद बड़ा होने का तनिक गुमान नहीं। गांव-वार्ड में होने वाले छोटे संघर्षों में भी जमीन पर बैठ शामिल हो जाना। घंटों समय देना आदत थी।

साथ के लोग चलने के लिए कहते, तो उनका एक ही जवाब हाेता- छोड़ के चले जाएंगे तो ई बेचारा को कौन देखेगा? अनौपचारिक बातचीत में भी बड़े सहज, सरल भाषा में मुस्कुराते हुए गंभीर बातें कह जाते। इन बातों के कारण दलीय दीवार टूट जाती और वे सबके प्रिय रघुवंश बाबू हो गए। शहर और जिले को भी अब ये बातें खूब याद आएंगी।



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Gone are the professors, socialist thinkers, politicians and weapons of struggle of the poor, oppressed, exploited and common people


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