घर पर भरपेट भोजन मिलना भी मुश्किल था, पर आईआईटी खड़गपुर से बना इंजीनियर
अब दसवीं बोर्ड परीक्षा में कुछ ही दिन बच गए थे। रात के लगभग 12 बज रहे थे। सुमित उस दिन टिमटिमाते हुए दीये में भी पढ़ने की कोशिश कर रहा था। काम बहुत था और समय बहुत कम। धनाभाव के कारण पिता सतेन्द्र कुमार की पढ़ाई अधूरी रह गई थी। घर में बटवारे के बाद हिस्से में मुश्किल से एक बीघा खेती की जमीन मिली थी।
वह नहीं चाहते थे कि सुमित खेती का काम करे लेकिन, उस साल आर्थिक तकलीफों के चलते सुमित को खेत के काम में भी अपने पिता का हाथ बंटाना पड़ा। फिर पढ़ाई के लिए समय निकाल पाना संभव नहीं हो पा रहा था। बिहार के पटना जिले के मसौढ़ी के रहने वाले इस परिवार को सुमित से बहुत ही उम्मीद थी। सुमित के दादाजी अक्सर गांव में बड़े विश्वास के साथ लोगों को बताते थे उनका पोता बहुत मेहनत करता है और एक दिन बहुत ही बड़ा आदमी बनेगा।
सुमित की पढ़ाई गांव के सरकारी स्कूल से ही शुरू हुई थी। बगैर किसी मार्गदर्शन के खुद से ही जब भी मौका मिलता, पढ़ने लग जाता था। बेटे को पढ़ाई करते देखकर मां सविता कुमारी बहुत खुश होती थी। खुद भूखी रहकर बेटे को भर पेट खाना खिलाती थी। जब किताब-कॉपी के लिए पैसे नहीं होते थे तब उसकी व्यवस्था नानाजी कर दिया करते थे।
पांचवीं क्लास से सुमित की चर्चा आस-पास के गांव में होने लगी। तब किसी की सलाह पर सुमित को उसके पिता गांव के बगल के ही प्राइवेट स्कूल में दाखिला करवाने के लिए ले गए। उसकी प्रतिभा से स्कूल वाले बहुत प्रभावित हुए। छठी क्लास से सुमित उसी स्कूल का विद्यार्थी हो गया लेकिन, कुछ ही दिनों बाद स्कूल वाले सुमित की बहुत अच्छी परफॉर्मेंस के बावजूद फीस मांगने लगे।
घर में सब बहुत परेशान हो गए। कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। मुश्किल से एक-दो महीने की फीस की ही व्यवस्था हो पाई। आख़िरकार स्कूल बदलना पड़ा लेकिन, सुमित ने हिम्मत नहीं हारी दोगुने उत्साह के साथ फिर से पढ़ाई में लग गया। समय बीतते देर नहीं लगी और दसवीं बोर्ड का नतीजा आ गया। सबकी उम्मीदों से भी ज्यादा अच्छा परिणाम रहा सुमित का। गांव वाले उसको बधाइयां दे रहे थे।
तब तक सुमित को आईआईटी के बारे में पता चल गया था और वह इंजीनियर बनने का सपना देखने लगा। परंतु आर्थिक तंगी की वजह से पटना आकर पढ़ाई करना उसके लिए संभव नहीं था। एक बड़े कोचिंग वाले ने एंट्रेंस टेस्ट का आयोजन किया। सुमित ने पटना आकर टेस्ट दे दिया। कोचिंग वाले ने कहा कि तुम अगर अच्छा करोगे तो तुम्हें स्कालरशिप मिलेगी।
सुमित अपने सुनहरे भविष्य की उम्मीद में अपनी पूरी ताकत के साथ टेस्ट दिया लेकिन, रिजल्ट के बाद कोचिंग सेंटर वाले ने बताया कि उसका सलेक्शन स्काॅलरशिप के लिए हो गया है बावजूद इसके उसे एक लाख बीस हज़ार रुपए पढ़ाई के लिए देने पढ़ेंगे। रहने और खाने का खर्च अलग से। सुमित के पिता ने कोचिंग सेंटर के संचालक को बहुत समझाने की कोशिश की। फिर भी सुमित का एडमिशन नहीं हुआ।
निराश सुमित पटना से अपने घर वापस आ रहा था। ट्रेन में चर्चा के दौरान किसी ने सुपर 30 के बारे में बताया। बीच रस्ते से ही दूसरी ट्रेंन पकड़कर वह मुझसे मिलाने पटना आ गया। मैंने उसकी प्रतिभा और जूनून को देखकर उसे अपना शिष्य बना लिया। सुपर 30 में सुमित इतनी मेहनत करता था कि सभी का दिल उसने जीत लिया।
वह रात 12 बजे तक पढ़ता था और सुबह 5 बजे उठ जाता था। एक दिन वह भी आ गया जब सुमित का नाम आईआईटी प्रवेश-परीक्षा के सफल विद्यार्थियों के लिस्ट में था। सुमित का एडमिशन आईआईटी खड़गपुर में हो गया। अब तो उसकी पढ़ाई भी पूरी हो गई और एक बड़ी कंपनी में नौकरी भी लग गई है।
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