1997 में जनता दल में हुई टूट, पूरा विधायक दल राजद के साथ आया; 2000 के विधानसभा चुनाव से दरकने लगा था लालू का तिलिस्म
(भैरव लाल दास) 2000 में हुए विधानसभा चुनाव के पूर्व कई उतार-चढ़ाव हुए। 1995 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद अजेय दिखने वाले लालू प्रसाद के समर्थक खुलआम कहने लगे कि बिहार में विकास करने से वोट नहीं मिलता है, वोट जातिगत समीकरण और लालू प्रसाद को चेहरा देखकर मिलता है। ‘जब तक रहेगा समोसा में आलू, तब तक रहेगा बिहार में लालू’ जैसे जनप्रचलित प्रशस्ति लिखे गए।
लालू प्रसाद के स्वभाव में आए अभिमान और दबंगई के कारण उनके अत्यंत नजदीकी सहयोगी उनसे दूरी बनाने लगे। 5 जुलाई 1997 को दिल्ली में हुई बैठक में लालू प्रसाद, रघुवंश प्रसाद सिंह और कांति सिंह ने भाग लिया और जनता दल का विघटन हो गया। लालू प्रसाद ने राष्ट्रीय जनता दल का गठन किया। नवगठित पार्टी में लोकसभा के 17, राज्यसभा के 8 और जनता दल विधानमंडल दल के सभी सदस्य आ गए।
अभिशाप बन खड़ा हुआ चारा घोटाला: इधर, लालू प्रसाद के लिए चारा घोटाला एक अभिशाप बनकर दरवाजे पर खड़ा हो चुका था। 27 जनवरी, 1996 को चाईबासा कोषागार में 37.7 करोड़ रुपए की हुई अनियमित निकासी का भंडाफोड़ तत्कालीन उपायुक्त अमित खरे ने कर दिया। इस जाल को तोड़ने की तरकीब लालू प्रसाद नहीं निकाल पाए। 11 मार्च, 1996 को पटना उच्च न्यायालय ने सीबीआई को चारा घोटाले की जांच करने का आदेश पारित कर दिया। 25 जुलाई, 1997 को मुख्यमंत्री का पदत्याग कर देना पड़ा।
शंकर बिगहा नरसंहार के बाद राष्ट्रपति शासन लगा, राज्यसभा में प्रस्ताव गिरा, राबड़ी फिर बनीं सीएम
25 जनवरी, 1999 को जहानाबाद के शंकर बिगहा में रणवीर सेना हाथों हुई 22 दलितों की हत्या के बाद बिहार का राजनीतिक तापमान बहुत गर्म हो गया। तत्कालीन राज्यपाल सुंदर सिंह भंडारी के प्रतिवेदन को आधार बनाकर केंद्र की भाजपा सरकार की सहयोगी समता पार्टी के दो कद्दावर मंत्रियों के दबाव के आगे सरकार विवश हो गई। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी उस समय जी-15 की बैठक के लिए जमाईका गए हुए थे और राष्ट्रपति केआर नारायणन कोलकाता में थे।
केंद्रीय कैबिनेट की बैठक की अध्यक्षता लालकृष्ण आडवाणी ने किया और लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई 18 माह पुरानी बिहार की राबड़ी देवी सरकार को 11 फरवरी, 1999 को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया। भले ही केंद्र की सरकार इस निर्णय पर मुंह चुराती रही लेकिन लोकसभा में बहुजन समाज पार्टी, तेलगू देशम और अकाली दल का समर्थन आसानी से प्राप्त कर लिया।
असली परीक्षा राज्यसभा में होने वाली थी, जहां सरकार अल्पमत में थी। लालू प्रसाद का साथ मुलायम सिंह यादव और कांग्रेस पार्टी ने दिया। राज्यसभा में प्रस्ताव खारिज हो गया। 2 मार्च 2000 को राबड़ी देवी पुन: मुख्यमंत्री बन गईं। इस सब मुद्दों को मिलाकर लालू प्रसाद कहते रहे कि गरीबों को, पिछड़ों को और दलितों को नीचा दिखाने के लिए उनके राजनीतिक विरोधी साजिश के तहत उन्हें चारा घोटाले में फंसा रहे हैं।
‘जंगल राज’ और राबड़ी-मोदी संवाद: लालू प्रसाद की पूरी ताकत चारा घोटाला, वकील, न्यायालय और अपनी सरकार बचाने में लगी हुई थी। राज्य में कानून व्यवस्था,विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि मूलभूत सेवाएं चरमरा रही थीं। सरकार पर नियंत्रण कुछ चंद लोगों का ही था जो लालू के इस राजनीतिक दलदल में फंसे होने का पूरा फायदा उठा रहे थे। विरोधियों ने इसे ‘जंगल राज’ के रूप में प्रचारित करना शुरू कर दिया।
पूरा बिहार लालू प्रसाद के समर्थन और विरोध में बंटा हुा था। लेकिन लालू प्रसाद और राबड़ी देवी लगातार आक्रामक तेवर अपनाए हुए थे। आमतौर पर कम बोलनेवाली राबड़ी देवी, भाजपा के सुशील मोदी को अपना ‘भाई’ कहती थीं। विधानसभा में सुशील मोदी ने राबड़ी देवी से कहा था कि मुख्यमंत्री आवास से बड़े अपराधियों को निकाल बाहर किया जाना चाहिए। उनका इशारा लालू प्रसाद की ओर था। राबड़ी देवी ने बड़े ही संयत भाव से कहा कि ठीक है, उन्हें निकाल कर आपके घर में भेज देंगे।
गांव में राजद की पकड़ के बावजूद उभरने लगा भाजपा-समता गठजोड़
2000 में हुए विधानसभा चुनाव के पूर्व ही लालू प्रसाद कई ओर से घिर चुके थे। 1998 मे हुए लोकसभा चुनाव में राजद, 54 में से 38 सीटों पर लड़ी और 17 जीती। 1999 में 54 सीटों में से 36 पर लड़ी लेकिन 7 सीटें ही राजद जीत सका इसके बावजूद कि मतदाताओं में यादव, मुसलमान, राजपूतों का एक बड़ा वर्ग लालू के समर्थन में था।
ग्रामीण क्षेत्र में उनकी पकड़ कमजोर नहीं हुई थी। यही कारण रहा कि भाजपा और समता पार्टी ने शहरी इलाकों, पिछड़ी जातियों में बनिया और उसकी उपजातियों के अतिरिक्त कायस्थ, भूमिहारों के एक बड़े वर्ग का समर्थन हासिल करना चाहा। उनके निशाने पर गैर यादव जातियां जिनमें कुर्मी, कोईरी, अत्यंत पिछड़ा वर्ग आदि जातियां थीं।
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