जमीन का ज्यादा मुआवजा लेने के लिए हाईकोर्ट को गलत जानकारी देकर 35 साल तक नहीं बनने दी नहर, नाराज जज ने ठोका 1 रुपए लाख जुर्माना
जी हां, ऐसा भी होता है। डॉ.रासलाल यादव (बसवा, अंधराठाढ़ी, मधुबनी) ने जमीन का ज्यादा मुआवजा पाने के लिए ऐसा चक्कर चलाया कि कोसी-सकरी-झंझारपुर नहर 35 साल से बनने के इंतजार में है। हालांकि, गुरुवार को यह इंतजार खत्म हुआ। असलीयत जानकर भड़के पटना हाईकोर्ट ने नहर निर्माण पर लगी रोक हटा दी; डॉ.रासलाल की याचिका खारिज की तथा उन पर एक लाख रुपया हर्जाना लगाया। कोर्ट का कहना था कि ‘हम इस फ्राड को देखकर आंख मूंदे नहीं रह सकते।’
दरअसल, इस दौरान डॉ.रासलाल ने हाईकोर्ट तक को गलत जानकारी दी थी। इसी के चलते 2008 में जस्टिस एसके कटरियार ने नहर के निर्माण पर रोक लगा दी थी। गुरुवार को चीफ जस्टिस संजय करोल तथा जस्टिस एस. कुमार की खंडपीठ ने यह रोक हटा दी, जमीन अधिग्रहण को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी तथा बेवजह अर्जी दायर करने, कोर्ट का समय बर्बाद करने और 35 वर्षों तक जनकल्याण के मामले को लटकाए रखने के लिए हर्जाना भरने का आदेश दिया। याचिका, डॉ.रासलाल उनकी पत्नी ललिता यादव तथा दो बेटे-राबिन व रोहित की थी।
राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता ललित किशोर ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि एक ही परिवार के चार सदस्यों की ओर से हाईकोर्ट में मुआवजा के लिए याचिका दायर की गई। जमीन अधिग्रहण की जानकारी याचिकाकर्ता को थी। उन्होंने जमीन का मुआवजा नहीं लिया और तथ्यों को छुपाकर हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।
सरकार ने कहा-कोर्ट को याचिकाकर्ता ने गुमराह किया
याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि इस नहर के निर्माण के लिए जमीन का अधिग्रहण वर्ष 1984-85 में किया गया। लेकिन जमीन अधिग्रहण किए जाने की कोई सूचना नहीं दी गई। बाद में मालूम हुआ कि जमीन का अधिग्रहण हो चुका है। उस समय जो जमीन की कीमत थी, उसी के हिसाब से मुआवजा भी तय किया गया। लेकिन काफी कम मुआवजा होने के कारण हमने स्वीकार नहीं किया और कोर्ट में आना पड़ा। 12 वर्ष पहले कोर्ट ने नहर के लिए जमीन अधिग्रहण पर रोक लगा दी थी।
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