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फ्लैशबैक: 1995 में मुसलमान भी लालू के हो गए मुरीद, समस्तीपुर में आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद तेजी से चढ़ा लालू का राजनीतिक ग्राफ

फ्लैशबैक: 1995 में मुसलमान भी लालू के हो गए मुरीद, समस्तीपुर में आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद तेजी से चढ़ा लालू का राजनीतिक ग्राफ

(भैरव लाल दास) 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव के पहले मंडल-कमंडल विवाद चरम पर था। वीपी सिंह की सरकार द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कर पिछड़ी जातियों की सहानुभूति अर्जित कर लिया गया था। भारतीय जनता पार्टी अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाने के लिए अयोध्या के राम मंदिर निर्माण का मुद्दा उछाला। कार सेवकों को एकजुट करने के लिए बीजेपी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी की रथयात्रा 25 सितंबर, 1990 को सोमनाथ से आरंभ हुई, जिसे 30 अक्टूबर को अयोध्या पहुंचना था।

इस रथयात्रा को रोकने की हिम्मत कई राज्य सरकारों को नहीं हुई। प्रधानमंत्री वीपी सिंह की सलाह पर बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने 23 अक्टूबर को समस्तीपुर में आडवाणी जी को गिरफ्तार करवा लिया। समस्तीपुर के जिलाधिकारी आरके सिंह को भी कुछ देर पहले ही जानकारी मिली कि क्या होने वाला है। कई घंटों तक टेलीफोन और संचार व्यवस्था को बंद कर दिया गया।

स्वयं लालू प्रसाद ने समाचार एजेंसी पीटीआई के पटना कार्यालय को फोन कर कहा कि ‘बाबा’ गिरफ्तार कर लिए गए। लेकिन आडवाणी को लेकर जब हेलीकॉप्टर दुमका के मसानजोर अतिथिशाला के लिए उड़ने लगा तो बहुत लोगों को इसका अंदाजा नहीं था कि इसके साथ लालू प्रसाद का राजनीतिक उत्कर्ष भी आसमान छूने वाला है। यह वही पल था जब बिहार में मुसलमान मतदाताओं का एक प्रकार से स्थायी झुकाव भी लालू प्रसाद के पक्ष में होने वाला था।

टीएन शेषन की कड़ाई का भी लाभ लालू को ही मिला
1955 बैच के तमिलनाडु कैडर के आईएएस अफसर टीएन शेषन का कैबिनेट सचिव के रूप में कार्यकाल समाप्त होने ही वाला था कि 1990 में उन्हें मुख्य निर्वाचन आयुक्त बनाया था। चुनावी उदंडता के लिए कुख्यात बिहार में निष्पक्ष चुनाव करानाा उनकी बड़ी चुनौती थी। प्रत्येक बूथ, यहां तक की प्रत्येक गली, चौराहों पर पुलिस की बंदोबस्त सुनिश्चित करने के लिए शेषन ने बिहार चुनाव को कई चरणों में बांट दिया। संदेश दिया कि चुनाव बुलेट नहीं बैलट से ही जीता जा सकता है।

इसी चुनाव में मतदाता पहचान पत्र को अनिवार्य किया गया। शेषन के कड़े तेवर के आगे बड़े-बड़े अपराधी ही नहीं, नेता और अधिकारी भी कांपने लगे। ऐसा माना जाने लगा कि पीवी नरसिम्हा राव की सरकार राजनीति से लालू को हमेशा के लिए बाहर करने के इरादे से इतने कठोर कदम उठा रही है। उधर, लालू का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर था। चुनाव पूर्व ही उन्होंने कहा था कि बैलट बॉक्स से जिन्न निकलेगा। और यही हुआ।

जनता त्रस्त, पर वोटर लालू प्रसाद के साथ
अब तक लालू प्रसाद पिछड़ों के मसीहा थे, लेकिन आडवाणी की गिरफ्तारी ने उन्हें मुसलमानों का नायक बना दिया। 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद देश की राजनीतिक परिस्थिति में लालू प्रसाद ने मान लिया कि बिहार की राजनीति में वह अजेय हैं। उधर, बिहार में अपराधियों का तांडव, अपहरण, फिरौती, जातीय जनसंहार और सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार ने बिहार की आधारभूत संरचना तक को ध्वस्त कर डाला। बिहार की जनता त्रस्त थी, लेकिन मतदाता लालू प्रसाद के पक्ष में ही थे।



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Flashback: Muslims also became Lalu's Murid in 1995, Lalu's political graph rose sharply after Advani's arrest in Samastipur


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