मुगल मेहराब शैली में निर्मित हैं प्राचीन गया के चार प्रवेश द्वार
(राजीव कुमार) गया शहर का सबसे पुराना हिस्सा अंदर गया अर्थात गयवाल पंडों का आवासीय परिसर है। बार-बार की लूट व आक्रमण से बचने को इस हिस्से की किलेबंदी की गई थी और चार दरवाजों से प्रवेश-निकासी की व्यवस्था थी। इस हिस्से की सुरक्षा को गयवाल 14 कंपनी निजी सैनिक बहाल कर रखे थे। आज भी चार दरवाजे कुछ जीर्णोद्धार के साथ मौजूद हैं।
मुगल काल में अंदर गया के इस हिस्सा को फिर से बसाया गया था। औरंगजेब के दरबारी शहरचंद चौधरी को इस्लाम ग्रहण करने के बाद गया में 04 हजार बीघा की जागीर दान में दी, जिसपर उसने वर्तमान अंदर गया के हिस्से को बसाया। बार-बार के एक समुदाय सहित अन्य के आक्रमण व लूटपाट से परेशान गयवालों ने इस हिस्से की किलाबंदी कर दी थी।
21 फीट ऊंचा है द्वार| द्वार की ऊंचाई 21 फीट व चौड़ाई 10 फीट है। मजबूत लकड़ी के दरवाजे होते थे। दरवाजे मुगलकालीन मेहराब की डिजाइन पर बने हैं। पहले इसके ऊपर बुर्ज की व्यवस्था थी। चारों ओर सुरक्षा की दृष्टि से दीवारों पर भी बुर्ज बनाए गए थे, ताकि निगरानी हो। दरवाजे के दोनों ओर गणेश की मूर्ति थी। अब सभी का जीर्णोद्धार हो चुका है।
राणा सांगा ने कराया था मुक्त:आक्रांताओं के बार-बार आक्रमण से गयवाल ब्राह्मणों को पलायन करना पड़ा था। वे कटारी, कुर्किहार, दुबहल, बोधगया सहित अन्य जगहों पर चले गए। तीन सौ सालों तक गया विरान रहा। 1525 में उदयपुर के राणा सांगा ने दुश्मनों को हराकर गया को मुक्त कराया। लेकिन 1660 तक गयवालों की आर्थिक व सामाजिक स्थिति बेहतर नहीं हुई।
ह्वेनसांग ने देखा था गयवालों को
चीनी यात्री ह्वेनसांग बोधगया जाने के क्रम में 640 ई.में गया शहर में एक हजार ब्राह्मणों को देखा था। इन ब्राह्मणों का समाज में अत्यधिक सम्मान था। जबकि इससे पहले आए चीनी यात्री फाह्यान ने इस संदर्भ में कुछ नहीं कहा है।
जर्मन भूगोलवेत्ता नेकिया उल्लेख
जर्मन भूगोलवेत्ता टीएनफंथलर ने बनारस से पटना तक गंगा की यात्रा के बाद 1760 में गया पहुंचा। उन्होंने अपने वृतांत में गयवालों के बारे में लिखा, यह ऐसी जगह है, जहां लुप्तप्राय हीरा पाया जा सकता है।
मराठा करते थे आक्रमण
1811 में सर्वेक्षण को गया पहुंचे हेमिल्टन बुकानन ने कहा, पुराना शहर, अंदर गया पर बार-बार मराठा आक्रमण व लूटपाट करते थे। गयवालों ने चार दरवाजों से सुरक्षित अपने शहर की सुरक्षा के लिए 14 कंपनी सुरक्षाकर्मी तैनात कर रखा था।
चार दरवाजें
- दक्षिण दरवाजा बंगाली आश्रम की ओर बाहर निकलता
- पश्चिमी दरवाजा टिल्हा धर्मशाला के सामने बहुआर चौरा की ओर
- पूर्वी दरवाजा देवघाट से फल्गु की ओर
- उत्तरी दरवाजा सेन जी ठाकुरवाड़ी से मल्लाहटोली की ओर
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