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14 दिन में 1310 किमी पैदल चलकर घर आए, फिर क्वारेंटाइन में रहे, विदाई में मिले नए कपड़े, गमछा, आईना और मास्क

14 दिन में 1310 किमी पैदल चलकर घर आए, फिर क्वारेंटाइन में रहे, विदाई में मिले नए कपड़े, गमछा, आईना और मास्क

कोरोना संकट से डरा-सहमा, पर हिम्मत नहीं हारा। 14 दिन तक लगातार 1310 किलाेमीटर की यात्रा कर राजस्थान से अपने घर बिहारीगंज के शेखुपरा पंचायत केकठौतिया पहुंचा।अपने के बीच आकर कोरोना से पीछा छुड़ाना चाहा, इसके लिए मकई की खेत में भी छिपा, पर जब क्वारेंटाइन सेंटर में जाकर 14 दिन बिताना पड़ा। अब वहां से निकला तो विदाई में मिले नए कपड़े, गमछा, आईना, तेल, साबुन, मास्क आदि के साथ। आंख में आंसू थे पर वह खुशी के। खुशी इस बात की वह बेदाग निकला है। परदेस से आने वाले प्रवासियों से उसकी अपील है कि यहां आने के बाद नियमों का पालन करें। घबराएं नहीं, डर के आगे ही कोरोना से जीत है। यह कहानी है शेखपुरा पंचायत के शंकर पाल व नंद कुमार पाल की। मध्य विद्यालय क्वारेंटाइन सेंटर में 14 दिन बिताकर घर लौटने पर उसने दैनिक भास्कर से पिछले डेढ़ माह के सुख-दुख को साझा किया। शंकर और नंद बताते हैं कि इन डेढ़ माह में उसने जीवन के हर-एक पहलू को सुना, महसूस किया, देखा और खुद झेला भी। मानो उसके लिए नया जीवन मिला है।
जिसे वह जबतक जीवित रहेगा, नए तरह से व नई उम्मीद के साथ जीएगा। उनसबों ने कई ऐसी बातें बताई जिससे आने वाले लोगों को एक प्रेरणा भी मिलेगी। शेखपुरा पंचायत के निवासी शंकर पाल व नंद कुमार पाल जब 14 दिन की यात्रा कर परदेस से अपने घर वापस लौटे, तो वे लोग बहुत खुश थे। उन्हें इस बात का एहसास हो रहा था कि अब उन्हें नई जिंदगी मिल गई है।
गांव वाले देखते थे शक की निगाह से
बीती हुई बातों को लेकर वे दोनों कहते हैं कि जब परदेस से वापस अपने घर लौटे, तो गांव वाले उन्हें शक की निगाह से देखते थे। गांव में उन्हें घुसने नहीं दे रहे थे। रातभर वे सभी बाहर के स्कूल में बिताए। घरवालों ने घर से खाना भिजवाया। दूसरे दिन पुलिस वालों के साथ डॉक्टरों की टीम आई, जिसकी भनक लगते वे सभी मक्का की खेत में छिप गए। बाद में ग्रामीणों ने खोजकर उन्हें मेडिकल टीम को सौंप दिया। वह सभी क्वारेंटाइन सेंटर पड़रिया पंचायत के मध्य विद्यालय लक्ष्मीपुर में भेज दिए गए।

परिवार से दूर रहने का हुआ बहुत दुख
दोनों ने बताया कि कुछ दिनों तक तो परिवार से दूर रहने का दुख हुआ, लेकिन बाद में वहां रह रहे लोगों से मिलकर जीने की आदत सी बन गई। मन हमेशा सशंकित रहता था। एक तरफ कोरोना से जंग जीतने की लड़ाई, तो दूसरी तरफ वहां रह रहे लोगों से सोशल डिस्टेंस का पालन करना, एक चुनौती के समान था। फिर भी उनलोगों ने अपने हौसले को बुलंद रखा। केंद्र पर रहने व खाने-पीने आदि के बाबत नंद कुमार पाल ने बताया कि उसे केंद्र में शुरू के दिनों में कुछ परेशानी हुई। लेकिन बाद में सारी व्यवस्था ठीक हो गई। वापसी की चर्चा करते हुए उसने बड़े ही मार्मिक अंदाज में बताया कि जब वह अपने नाना, नानी के घर जाता था तो बचपन में उसे नए कपड़ा व हाथ में कुछ रुपए विदाई में मिलते थे। ठीक उसी प्रकार की विदाई क्वारेंटाइन सेंटर से वापस होने पर उन्हें मिला। नए कपड़े, गमछा, आईना, तेल, साबुन, मासक आदि सारे सामान उसे दिए गए। जिसे वह हमेशा याद रखेगा। लेकिन एक बात उसे सदा चुभता रहेगा कि अन्य पंचायत के जनप्रतिनिधि अन्य लोगों से मिलने आते रहे, पर उससे मिलना उसके पंचायत के जनप्रतिनिधि मुनासिब नहीं समझे। उसने आने वाले दिनों में बाहर से आने वाले गरीब मजदूरों से यह भी अपील की कि वे डरें नहीं,अपना स्क्रीनिंग टेस्ट शिविर में पहुंचकर जरूर कराएं। ताकि अपने गांव व क्षेत्र के लोग कोरोना जैसी संक्रामक बीमारी से संक्रमित न हो सकें। इसके साथ ही जांच कराने से सारी परेशानी दूर हो जाएगी।



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क्वारेंटाइन सेंटर से लौटे दोनों दोस्त, जो राजस्थान से पैदल चलकर आए थे।


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