जीवन जीने की शर्तें मानो सिर उठाकर पूछ रही हैं...और कितने दिन!
एक अजीब सी दहशत फिजां में पसरती रही। 25 फरवरी से अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप के स्वागत समारोह और भारत-अमरीकी संबंधों पर लोग सुनहरे सपने बुनने में जुटे रहे थे कि चीन के वुहान से निकला सांप (कोरोना वायरस) रेंगते हुए पूरी दुनिया को असमय काल के गाल में समाने उतारू हो रहा था।
भारत में कोरोना की गंभीरता व स्थिति की भयावहता को समझते हुए प्रधानमंत्री ने 23 मार्च की मध्य रात्रि से लॉकडाउन की घोषणा कर दी। मधेपुरा जैसे जनपद के लिए विकट स्थिति थी। जिसकी बहुसंख्यक आबादी मध्यमवर्गीय अथवा निम्न मध्यवर्गीय है। राष्ट्रीय घोषणा के साथ ही इस लॉकडाउन का प्रभाव स्पष्ट दिखने लगा। शाम होते ही सन्नाटे में शहर का डूब जाना, दिन में इक्के-दुक्के जरूरत की वस्तुओं के क्रेता, खामोशी का आलम चतुर्दिक फैला हुआ है। पुलिसकर्मियों से कंपित ग्रामीण, मजदूर व मटरगश्ती करते युवाओं ने भी अपने को घर में सिमट लिया है। पुलिस की बढ़ी जिम्मेदारियों और चौकसी से जनता कर्फ्यू का पालन प्रत्येक ओर दिखता रहा। लेकिन हप्ता-दो हफ्ता के अंदर ही अंदर अनिवार्य मानवीय आवश्यकताएं सिर उठाने लगी हैं। घर का रशद-पानी, बच्चों की पढ़ाई, अनिवार्य यात्राएं, जीवन जीने की अनिवार्य शर्तें मानो सिर उठाकर पूछ रही हैं- और कितने दिन! मधेपुरा जो संभावनाओं से भरा शहर है। हालिया खुले मेडिकल काॅलेज अस्पताल व रेल कारखाने की वजह से देश के विभिन्न हिस्से के चिकित्सक, प्राध्यापक, अभियंताओं सहित श्रमिक, छोटे व मध्यम दर्जे के व्यवसायी सभी ने कोरोना महामारी से एकजुट होकर अपना समय घरों में ही बिताया। मधेपुरा में कोरोना की विकरालता नहीं दिखी, इस विपत्ति काल में यहां की आम जनता के अनुशासन व राष्ट्र की मुख्यधारा से कंधे से कंधा मिलाने का अनुपम उदाहरण पेश किया। मधेपुरा सदर व आसपास के इलाके के लोग मुख्यतः कृषि पर आधारित कार्यों एवं श्रम संसाधन से अपनी आजीविका चलाते हैं। इस लॉकडाउन ने उनकी आजीविका को बहुत हदतक तोड़ कर रख दिया है। क्योंकि जमा पूंजी के दिन भी गिने चुने होते हैं। गेहूं की कटाई व नए फसल की बुआई लॉकडाउन की भेंट चढ़ गयी। परिजन जो दूसरे राज्य कमाने गए थे वे अचानक इस घोषणा से घर तक नहीं पहुंच पाए। अब तो लॉकडाउन की भयावहता दैनिक श्रमिक व असंगठित क्षेत्र के मजदूरों पर स्पष्ट दिखने लगी है। एक बड़ी आबादी तक सभी सरकारी सहायताओं का प्रतिकूल परिस्थिति में पहुंच पाना असंभव दिखता सा दिखता है। वाहन, परिवहन की अनुपलब्धता व कुछ इलाके की कुख्यात सड़कें सरकारी आदेशों को खारिज करने के लिए काफी है। 3 मई को कुछ शर्तों के साथ लॉकडाउन की समाप्ति की संभावना दिखती है। जिले की तहस-नहस अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना एक बड़ी चुनौती है। सरकारी स्तर पर कई घोषणाओं की प्रतीक्षा यहां की आम जनता को है। मजदूर, कृषिकर्म से जुड़े श्रमिक, निम्न व लघु व्यवसायों की माली हालत सुधारना सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
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